नगर पालिका परिषद, शिकारपुर - ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में स्थित शिकारपुर नगर ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह नगर न केवल अपने धार्मिक स्थलों, पुराने किलों और सामाजिक संरचनाओं के लिए जाना जाता है, बल्कि इसका इतिहास भी हज़ारों वर्षों पुराना है, जो इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्राचीनतम नगरों में से एक बनाता है।
प्राचीन काल में शिकारपुर
शिकारपुर का क्षेत्र प्राचीन काल में कुरु और पांचाल महाजनपदों के प्रभाव में था। माना जाता है कि यह क्षेत्र हस्तिनापुर से लेकर मथुरा, मेरठ, और बुलंदशहर तक फैले पांचाल देश का हिस्सा था। महाभारत काल में हस्तिनापुर और उसके आस-पास के क्षेत्र विशेष धार्मिक और राजनीतिक महत्व रखते थे, और शिकारपुर भी उस भूगोल का हिस्सा माना जाता है।
बौद्ध साहित्य और पुराणों में इस क्षेत्र का उल्लेख विभिन्न नामों से मिलता है। यहाँ नंद वंश, मौर्य वंश, शुंग वंश, कुषाण वंश, और गुप्त साम्राज्य का शासन क्रमशः रहा। गुप्त काल में यह क्षेत्र समृद्ध था और विद्या, संस्कृति तथा धर्म के केंद्र के रूप में जाना जाता था।
मध्यकालीन इतिहास
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद यह क्षेत्र कन्नौज के राजाओं के नियंत्रण में आया, विशेषकर हर्षवर्धन के शासन में। हर्ष की मृत्यु के पश्चात यह क्षेत्र तोमर, प्रतिहार एवं चौहान राजाओं के अधीन हो गया। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में भी इस क्षेत्र का प्रशासनिक महत्व बना रहा।
1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद जब भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत हुई, तो दिल्ली सल्तनत ने इस क्षेत्र को अपने अधीन किया। खिलजी, तुगलक, लोदी और अंततः मुग़ल शासकों ने यहाँ प्रशासनिक चौकियाँ और सैनिक ठिकाने स्थापित किए। शिकारपुर में उस समय के किला, जामा मस्जिद, तथा अन्य इमारतें इस युग की गवाह हैं।
यह नगर शिकारगाह के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि दिल्ली के शाही परिवार यहाँ के वन क्षेत्रों में शिकार खेलने आते थे, और इसीलिए इस स्थान का नाम "शिकारपुर" पड़ा।
मुग़ल और नवाब काल
अकबर के शासनकाल में यह क्षेत्र आगरा सूबे का हिस्सा था और यहाँ परगना व्यवस्था के तहत कर संग्रह होता था। शिकारपुर का नाम आइन-ए-अकबरी में भी दर्ज है। इसके बाद यह क्षेत्र अवध के नवाबों के अधीन गया और प्रशासनिक दृष्टि से इसका महत्व और बढ़ा।
इस काल में धार्मिक सहिष्णुता बढ़ी और नगर में कई मंदिर, मस्जिदें और सरायों का निर्माण हुआ। यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल जैसे श्री बालाजी मंदिर, शिव मंदिर, और जामा मस्जिद इसी काल के दौरान बनवाए गए।
ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता संग्राम
1803 ई. में यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आ गया। अंग्रेजों ने शिकारपुर को एक महत्त्वपूर्ण कस्बा माना और यहाँ राजस्व संग्रह एवं प्रशासनिक कार्यों के लिए कार्यालय स्थापित किए।
1857 की क्रांति के दौरान शिकारपुर और इसके आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। कई क्रांतिकारियों ने यहाँ अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह किया और बलिदान दिए। अंग्रेजों ने इसके बाद यहाँ अपना नियंत्रण और अधिक मज़बूत किया।
आधुनिक काल में शिकारपुर
आज शिकारपुर एक तेज़ी से विकसित हो रहा नगर है, जो कि बुलंदशहर जिले की प्रमुख नगर पालिका परिषदों में गिना जाता है। यह नगर कृषि, पशुपालन, और लघु उद्योगों का केंद्र है। यहाँ के किसान मुख्यतः गन्ना, गेहूं और धान की खेती करते हैं। साथ ही साथ, यहाँ के कुम्हार समाज द्वारा मिट्टी के बर्तन, हांडी, कुल्हड़, और अन्य हस्तशिल्प का निर्माण किया जाता है।
नगर में शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। यहाँ कई विद्यालय, महाविद्यालय और कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। स्थानीय युवाओं की बढ़ती भागीदारी प्रशासन, सेना, पुलिस, शिक्षा, व्यवसाय और तकनीकी क्षेत्रों में देखी जा रही है।
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प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- श्री बालाजी मंदिर – नगर का प्रमुख धार्मिक स्थल
- प्राचीन किला परिसर – ऐतिहासिक धरोहर
- शिव मंदिर – श्रद्धालुओं का आस्था केंद्र
- जामा मस्जिद – मुग़ल काल की स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण
- रामलीला मैदान – प्रत्येक वर्ष होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों का मुख्य केंद्र
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परिवहन और संपर्क सुविधा:
शिकारपुर सड़क मार्ग से बुलंदशहर, स्याना, जहांगीराबाद, अलीगढ़, हापुड़ आदि से जुड़ा हुआ है। इसके निकटवर्ती रेलवे स्टेशन बुलंदशहर, सिकंदराबाद एवं अलीगढ़ हैं। यह नगर दिल्ली NCR क्षेत्र से भी पास है, जिससे इसका व्यापारिक महत्व और बढ़ जाता है।





